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शिक्षक का मौन और सिसकता भविष्य: कहाँ खो गई गुरु की गरिमा?

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“जब शिक्षक चुप रहता है, तब व्यवस्था बोलती है… और जब शिक्षक बोलता है, तब बदलाव जन्म लेता है।” एक क्लासरूम सिर्फ ईंट और कंक्रीट से बनी चार दीवारों का नाम नहीं होता। यह वह पवित्र स्थान है जहाँ सपने पलते हैं, व्यक्तित्व के डर टूटते हैं और राष्ट्र का भविष्य गढ़ा जाता है। लेकिन आज इसी भविष्य की नींव रखने वाला शिल्पकार, यानी शिक्षक, खुद अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष करता नज़र आ रहा है। एक परामर्शदाता (Counselor) के तौर पर जब मैं स्कूलों के गलियारों से गुजरता हूँ, तो मुझे अनुशासन की गूँज कम और शिक्षक की लाचारी का शोर ज्यादा सुनाई देता है। दोहरी मार झेलता शिक्षक आज का शैक्षिक परिवेश शिक्षक के लिए एक चक्रव्यूह बन गया है। यदि वह बच्चे की किसी गलती पर उसे टोक दे, तो उसकी शिक्षण पद्धति पर सवाल उठाए जाते हैं। यदि वह सख्ती से समझाए, तो उसे 'क्रूर' या 'पुराने ख्यालात' का मान लिया जाता है। और यदि इन सबसे थककर वह मौन धारण कर ले, तो प्रबंधन और अभिभावक उसे 'अकुशल' कहकर कटघरे में खड़ा कर देते हैं। यानी हर परिस्थिति में दोष शिक्षक का ही है। हाल ही में एक घटना सामने आई जहाँ एक...