शिक्षक का मौन और सिसकता भविष्य: कहाँ खो गई गुरु की गरिमा?



“जब शिक्षक चुप रहता है, तब व्यवस्था बोलती है… और जब शिक्षक बोलता है, तब बदलाव जन्म लेता है।”

एक क्लासरूम सिर्फ ईंट और कंक्रीट से बनी चार दीवारों का नाम नहीं होता। यह वह पवित्र स्थान है जहाँ सपने पलते हैं, व्यक्तित्व के डर टूटते हैं और राष्ट्र का भविष्य गढ़ा जाता है। लेकिन आज इसी भविष्य की नींव रखने वाला शिल्पकार, यानी शिक्षक, खुद अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष करता नज़र आ रहा है। एक परामर्शदाता (Counselor) के तौर पर जब मैं स्कूलों के गलियारों से गुजरता हूँ, तो मुझे अनुशासन की गूँज कम और शिक्षक की लाचारी का शोर ज्यादा सुनाई देता है।

दोहरी मार झेलता शिक्षक

आज का शैक्षिक परिवेश शिक्षक के लिए एक चक्रव्यूह बन गया है। यदि वह बच्चे की किसी गलती पर उसे टोक दे, तो उसकी शिक्षण पद्धति पर सवाल उठाए जाते हैं। यदि वह सख्ती से समझाए, तो उसे 'क्रूर' या 'पुराने ख्यालात' का मान लिया जाता है। और यदि इन सबसे थककर वह मौन धारण कर ले, तो प्रबंधन और अभिभावक उसे 'अकुशल' कहकर कटघरे में खड़ा कर देते हैं। यानी हर परिस्थिति में दोष शिक्षक का ही है।

हाल ही में एक घटना सामने आई जहाँ एक छात्र ने शिक्षक के सामने निर्भीकता से कहा— "Ma’am, मुझे क्या प्रॉब्लम होगी?" यह शब्द केवल एक उद्दंड छात्र के नहीं हैं, बल्कि यह उस ढहते हुए सामाजिक ढांचे का प्रतीक हैं जहाँ शिक्षक का आत्मसम्मान शून्य हो चुका है।

अनुशासन बनाम अधिकार

समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि शिक्षक मारना नहीं चाहता, वह बिगड़ते आचरण को रोकना चाहता है। वह डर पैदा नहीं करना चाहता, वह मर्यादा सिखाना चाहता है। मर्यादा और डर के बीच की महीन रेखा को आज धुंधला कर दिया गया है। आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि क्लासरूम की चुनौतियों में शिक्षक बिल्कुल अकेला पड़ गया है। न सिस्टम उसके पीछे खड़ा है, न ही समाज उसकी पीड़ा को समझने को तैयार है।

शिक्षा: नौकरी या आंदोलन?

याद रखिए, जिस दिन शिक्षक ने सच में बोलना शुरू कर दिया और समाज ने उसकी आवाज़ को दबाना बंद किया, उस दिन शिक्षा सिर्फ एक 'नौकरी' नहीं रहेगी, बल्कि एक जीवंत 'आंदोलन' बन जाएगी। हमें एक ऐसे वातावरण की आवश्यकता है जहाँ शिक्षक को 'अधिकार' मिले, न कि भय। उसे 'सम्मान' मिले, न कि हर बात पर स्पष्टीकरण का बोझ। उसे समाज का 'साथ' मिले, न कि षड्यंत्र।

निष्कर्ष: समय की पुकार

जरूरत है एकता की— शिक्षकों, अभिभावकों और प्रशासन की। हमें यह स्वीकार करना होगा कि यदि शिक्षक का मनोबल टूट गया, तो देश का भविष्य कभी संभल नहीं पाएगा। एक शिक्षक की आवाज़ आज भी केवल एक ही लक्ष्य रखती है— आपके बच्चे का बेहतर कल।

क्या हम एक समाज के रूप में उसे वह सम्मान और सुरक्षा दे पा रहे हैं जिसका वह हकदार है? यदि नहीं, तो आने वाली पीढ़ियां इस मौन का हिसाब जरूर मांगेंगी।

लेखक परिचय: अमन मान एक अनुभवी स्टूडेंट काउंसलर हैं, जो वर्षों से किशोरों के व्यवहार और शैक्षिक सुधारों पर कार्य कर रहे हैं।

Comments

Popular posts from this blog

CLASS 7 SOCIAL SCIENCE 2025-26 MID TERM

ONLINE CONTENT CLASS VIII SOCIAL SCIENCE

Literacy Rate in India 2025: State-Wise Insights