कट्टरपंथी-दकियानूसी विचारधारा और इसके प्रभाव

कट्टरपंथी दकियानूसी विचारधारा और इसके प्रभाव..






कट्टरपंथी- दकियानूसी विचारधारा एक ऐसी मानसिकता है जो समाज में विभाजन और असमानता को बढ़ावा देती है। यह विचारधारा अक्सर महिलाओं के प्रति भेदभाव और असमानता को बढ़ावा देती है, जैसे कि लड़कियों को पुरुषों से नहीं पढ़ने देना या पुरुष अध्यापकों को लड़कियों को प्रोत्साहित करने या शंका समाधान हेतु नहीं बुलाने देना और असमंजस की बात यह भी है कि,जिन पर कट्टरपंथी सोच हावी होती है वह स्वयं के स्तर,लिंग और कर्तव्य को भूलकर कट्टरता के ही आधीन होकर उसी कट्टरपंथी सोच के अनुसार कार्य करते हैं,इसके अतिरिक्त वो‌‌ स्वयं की पहचान को भी भुलाकर केवल कट्टरता का ही आलिंगन करते हैं और उसी के वशीभूत होकर आचरण करते हैंI

यहां तक कि कट्टरपंथी सोच के वशीभूत एक महिला भी महिला समानता और विकास के विरुद्ध बिगुल फूंकने से परहेज नहीं करती और पुरुषों द्वारा महिलाओं को ना पढ़ाने और उनसे वार्ता ना करने तथा पुरुष अध्यापक के छात्राओं संग पिता पुत्री तुल्य संबंध को भी पचा नहीं पाती और,अपनी तालिबानी सोच के तहत,हर उस बात का विरोध करती है जो उसकी कट्टरपंथी सोच के विरुद्ध है I

ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा के समर्थक अक्सर अपनी स्वयं की पारिवारिक पृष्ठभूमि और अनुभवों के आधार पर ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। जिन महिलाओं को कभी पिता का प्यार नहीं मिला और वह स्वयं के पिता और भाई के चरित्र पर भी विश्वास नहीं कर पाती, वह किसी पर पुरुष द्वारा दूसरों की बच्चियों के प्रति वात्सल्य की परिकल्पना भी नहीं कर सकती।

ऐसे लोग जो स्वयं के परिवार और पटल में चरित्रहीनता देखते, अनुसरण करते और अनुभव कर चुके हैं और कभी स्वयं भी उत्कृष्ट चरित्र नहीं बना सकें, एक पुरुष को सदा ही संदेह और ईर्ष्या के भाव से देखते हैं।

एक उदाहरण के रूप में, एक अध्यापिका ने एक लड़की को पुरुष अध्यापक के पास नहीं भेजने का फैसला किया, क्योंकि वह सोचती थी कि पुरुष अध्यापक लड़की के साथ अनुचित व्यवहार कर सकते हैं। लेकिन वास्तव में, यह अध्यापिका की अपनी मानसिकता की समस्या थी, जो उसे पुरुषों के प्रति संदेह और ईर्ष्या के भाव से देखने के लिए मजबूर करती है।


ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा का विरोध करना आवश्यक है, क्योंकि यह समाज में विभाजन और असमानता को बढ़ावा देती है। हमें ऐसी विचारधारा का विरोध करना चाहिए और समाज में समानता और न्याय के लिए अपना अंशदान करना चाहिए।

शिक्षा क्षेत्र में दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले शिक्षकों की सोच के कारण, परिणाम और निदान निम्नलिखित हैं:

कारण:

1. पारंपरिक और रूढ़िवादी सोच: कुछ शिक्षक पारंपरिक और रूढ़िवादी सोच के कारण दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले विचारों को बढ़ावा देते हैं।

2. शिक्षा प्रणाली में कमियां: शिक्षा प्रणाली में कमियां और प्रशिक्षण की कमी के कारण शिक्षक दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले विचारों को बढ़ावा दे सकते हैं।

3. सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव: सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव के कारण शिक्षक दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले विचारों को बढ़ावा दे सकते हैं.


परिणाम:

1. छात्रों के बीच भेदभाव: दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले शिक्षकों के कारण छात्रों के बीच भेदभाव हो सकता है।

2. छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले शिक्षकों के कारण छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है।

3. शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रभाव: दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले शिक्षकों के कारण शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ सकता है।


निदान:

1. शिक्षकों के प्रशिक्षण में सुधार: शिक्षकों के प्रशिक्षण में सुधार करने से दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले विचारों को कम किया जा सकता है।

2. शिक्षा नीतियों में सुधार: शिक्षा नीतियों में सुधार करने से दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले विचारों को कम किया जा सकता है।

3. छात्रों के बीच जागरूकता बढ़ाना: छात्रों के बीच जागरूकता बढ़ाने से दकियानूसी कट्टरपंथी और लिंगभेद करने वाले विचारों को कम किया जा सकता है।

ध्यान रहे कि भारतीय शिक्षा नीति २०२० और भारतीय न्याय संहिता के अनुसार लिंग के आधार पर असमानता का व्यवहार एक कानूनी अपराध है साथ ही,एक शिक्षक के रूप में, पुरुषों की विश्वसनीयता और वात्सल्य का महत्व अत्यधिक है। एक पुरूष शिक्षक भी अपने छात्रों के प्रति जिम्मेदारी और अनुबंध का निर्वहन करता है और उसी विश्वसनीयता का अधिकारी है जिसपर केवल कुछ लोगों ने अपनी अघोषित सत्ता स्थापित की हुई है I

कुछ लोग, जैसे कि वह महिला अध्यापिका अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर पुरुषों की छवि बना लेते हैं और उसमें उसी की छवि देखना चाहते हैं जिनसे उन्हें नकरात्मक अनुभव प्राप्त होते रहे हैं ,ऐसी सोच और आंकलन पूर्णतः गलत और भेदभावपूर्ण है।


ऐसे मामलों में, कानूनी समानता की बात करना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए, और किसी भी प्रकार का भेदभाव या अन्याय नहीं होना चाहिए तथा,ऐसे लोग जो इस प्रकार की निकृष्ट सोच को आवाम में आयाम देते हैं,और ऐसी नकरात्मक सोच को दिशा देते हैं,उनके खिलाफ कठोरतम कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए Iउस महिला अध्यापिका के मामले में, कानूनी कार्यवाही की आवश्यकता है साथ ही उसकी दकियानूसी सोच और व्यवहार को विराम देना नितांत आवश्यक है ताकि,उसकी व्यक्तिगत राय और अनुभव समाज और शिक्षा के पवित्र क्षेत्रो पर काबिज ना हो सके। उसे अपने निर्णय के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, और उसे यह समझना चाहिए कि उसका निर्णय गलत और भेदभावपूर्ण था। इसके लिए उसे सार्वजनिक क्षमा याचना करके स्वयं की मनोदशा पर लज्जित होना चाहिए और यदि,यह कर पाने में उसका व्यक्तित्व उसके आडे आ रहा है तो,उसे तत्काल शिक्षा के क्षेत्र को छोड़कर अपनी समझ और सोच के अनुसार व्यवसाय में प्रवेश करना चाहिए I


इसके अलावा, शिक्षा विभाग को भी इस मामले में कार्यवाही करनी चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी शिक्षक, चाहे पुरुष हों या महिला, अपने छात्रों के प्रति जिम्मेदारी और प्यार के साथ व्यवहार करें तथा सहकर्मी बिना किसी लैंगिक भेदभाव के शिक्षण और समाज निर्माण के सात्विक कार्य को दिशा और सकारात्मक दशा प्रदान कर सकें I


निष्कर्ष: पुरुषों की विश्वसनीयता और वात्सल्य का भी समान महत्व है,और हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी लोग, चाहे पुरुष हों या महिला, समान अधिकार,सम्मान और अवसर के अधिकारी हैं। समानता और न्याय का सम्मान और अनुपालन हमारा कर्तव्य है, और हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी लोग समान रूप से व्यवहार अपने अधिकारों को भलि भांति समझ सकें और उनका इस्तेमाल कर सके।


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