शिक्षा का क्षरण: एक गहन विश्लेषण
शिक्षा का क्षरण: एक गहन विश्लेषण
शिक्षा, समाज का दर्पण होती है। यह न केवल व्यक्ति के बल्कि समाज के समग्र विकास का आधार है। परंतु आज हम शिक्षा के क्षेत्र में एक गंभीर संकट देख रहे हैं। शिक्षक, जो ज्ञान के दीपक होते हैं, वे स्वयं अंधकार में डूबे हुए हैं। शिक्षा के मंदिरों में अयोग्य पुजारी बैठे हैं, जो ज्ञान की बजाय अंधविश्वास बो रहे हैं।
सच्चे शिक्षक: एक विलुप्त होती प्रजाति-
एक सच्चा शिक्षक मात्र ज्ञान देने वाला नहीं होता, वह तो एक मूर्तिकार होता है, जो मिट्टी के कणों को तराशकर एक सुंदर प्रतिमा बनाता है। उसमें विद्यार्थी के प्रति अगाध प्रेम, ज्ञान की गहरी समझ, और चरित्र का उच्च स्तर होता है। परंतु आज हम ऐसे शिक्षकों को ढूंढते फिर रहे हैं।
अयोग्यता का प्रवेश-
शिक्षण क्षेत्र में अयोग्य लोगों का प्रवेश एक गंभीर समस्या है। योग्यता के स्थान पर रिश्वत और सिफारिशें बोलती हैं। नतीजतन, शिक्षण संस्थानों में ज्ञान की जगह अज्ञानता का बोलबाला है।
सच्चे शिक्षक पर आरोप-
अयोग्य शिक्षकों के कारण सच्चे शिक्षकों पर भी अंगुली उठती है। उन पर अनेक प्रकार के आरोप लगाए जाते हैं, जिससे उनका मनोबल टूटता है।
भिन्न संस्कृतियों का टकराव-
आज भारत में विविध संस्कृतियाँ एक साथ रहती हैं। एक संस्कृति में जो व्यवहार स्वीकार्य है, दूसरी संस्कृति में वह अस्वीकार्य हो सकता है। उदाहरण के लिए, एक संस्कृति में शिक्षक विद्यार्थी के साथ मित्रवत व्यवहार करता है, जबकि दूसरी संस्कृति में शिक्षक को एक अधिकारवादी व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। इस तरह के भिन्न दृष्टिकोणों के कारण शिक्षकों के बीच टकराव और अविश्वास पैदा होता है।
एक उदाहरण-
मान लीजिए एक शिक्षक, जो एक ऐसी संस्कृति से आता है जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी के बीच मित्रवत संबंध होता है, एक ऐसी संस्कृति के विद्यालय में पढ़ाता है जहाँ शिक्षक को एक अधिकारवादी व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। यदि वह अपने विद्यार्थियों के साथ मित्रवत व्यवहार करता है, तो दूसरे शिक्षक उस पर आरोप लगा सकते हैं कि वह विद्यार्थियों के साथ अनुचित संबंध रखता है।
भिन्न पृष्ठभूमि और सोच से आए अध्यापक
भिन्न पृष्ठभूमि और सोच से आए अध्यापक ट्रेनिंग के बाद भी तासीरी सोच के वशीभूत होकर भिन्नता का प्रचार-प्रसार करते हैं उदाहरणार्थ, व्यक्ति की परवरिश और वातावरण के आधीन बनी सोच भिन्न हो सकती है और इसी क्रम में,यदि अलग अलग शिक्षक अलग अलग पृष्ठभूमि,सोच और परवरिश के आधीन उत्पन्न विचारधारा और सोच के वशीभूत होकर कोई निर्णय या कटाक्ष करेंगे तो, संभवतः उनकी यह प्रतिक्रिया दूसरे शिक्षकों के द्वारा स्वीकार्य नहीं होगी और,ऐसे में टकराव जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
ऐसी नकरात्मक संकुचित सोच जहरीली और विनाशक है जो कि, लिंग समानता, वात्सल्य, मानवीय मूल्यों और शिक्षक- शिक्षार्थी संबंध पर मतभेद या संदेह उत्पन्न करें या फिर,अपनी दकियानूसी सोच के अनुसार किसी के भी व्यक्तित्व या चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाए।ऐसी संकुचित सोच के लोगों को शिक्षा क्षेत्र से दूरी बना कर अपनी सोच और समझ के अनूरूप पटलों पर कार्य करने चाहिए क्योंकि,उनकी शिक्षा जगत में उपस्थिति छात्र -छात्राओ के सर्वांगीण विकास और शिक्षक के दायित्व पूर्ति में बाधक सिद्ध हो सकती हैं I
निष्कर्ष-
शिक्षा का क्षरण एक गंभीर समस्या है, जिसके लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। हमें शिक्षण क्षेत्र में योग्य लोगों को लाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। साथ ही, हमें विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को एक साथ लाने के लिए प्रयास करने होंगे ताकि शिक्षकों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग का वातावरण बन सके।
सुझाव-
- योग्यता आधारित चयन: शिक्षकों का चयन केवल योग्यता के आधार पर होना चाहिए।
- शिक्षकों का प्रशिक्षण: शिक्षकों को समय-समय पर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए ताकि वे अपने ज्ञान और कौशल को अद्यतन रख सकें।
- शिक्षकों का सम्मान: शिक्षकों का समाज में सम्मान होना चाहिए।
- विभिन्न संस्कृतियों का आदर: हमें विभिन्न संस्कृतियों का आदर करना चाहिए और एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करना चाहिए।
-शिक्षा क्षेत्र में वात्सल्य और भावनात्मक संबंधों को स्वीकृति दी जानी चाहिए और जो नकरात्मक सोच के लोग हैं उन्हें शिक्षा क्षेत्र से दूर रखना चाहिए I
- शिक्षा नीतियों में सुधार: शिक्षा नीतियों में सुधार किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाया जा सके।
यदि हम इन सुझावों पर अमल करेंगे तो निश्चित रूप से हम शिक्षा के क्षेत्र में सुधार ला सकते हैं।

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