किस्मत और हिम्मत
वाराणसी की तंग गलियों में एक पुरानी हवेली थी, जहाँ जीवन अपनी सबसे कठोर परिभाषा में अमन नामक बालक से खेल रहा था। नौ साल की उम्र में माँ की ममता से वंचित हो जाना किसी बच्चे के लिए सबसे बड़ा दुःस्वप्न होता है। पर अमन के लिए यह मात्र दुःस्वप्न नहीं, रोजमर्रा की हकीकत थी। सौतेली माँ के कटाक्ष, पिता की उपेक्षा और समाज की उदासीनता के बीच वह जैसे समय के थपेड़े सहता रहा।
कभी चुपचाप गंगा किनारे बैठकर वह अपनी माँ की यादों से बातें करता, कभी टूटे-फूटे सपनों को जोड़ने की नाकाम कोशिश करता। मगर हर दिन के साथ उसकी आँखों में एक नयी आग जन्म लेती। वह जानता था कि जीवन की यह अवस्था स्थायी नहीं हो सकती। एक दिन उसे खुद अपने जीवन की कहानी लिखनी होगी।
बारहवें बसंत में जब बच्चे स्कूल की किताबों में डूबे रहते हैं, अमन के जीवन ने दूसरी दिशा पकड़ ली। एक दिन पिता के भद्दे अपशब्दों ने उसके सब्र की दीवार को तोड़ दिया। अमन ने एक फटी पुरानी झोली में माँ की तस्वीर और अपनी चंद किताबें रखीं और घर छोड़ दिया।
बिना किसी ठिकाने और योजना के, वह दिल्ली की ओर निकल पड़ा। किसी अनजान शहर में पहुँचकर उसके सामने भूख, ठंड और डर की असंख्य दीवारें खड़ी थीं। लेकिन एक दीवार जो सबसे मजबूत थी, वह थी उसके भीतर पल रहा आत्म-सम्मान।
दिल्ली ने अमन का स्वागत किया—निर्ममता के साथ। हर चौराहे पर अनदेखे चेहरे, हर गली में अजनबीपन और हर रात एक नई चुनौती।
पहले दिन वह एक ढाबे के बाहर खाली बर्तनों के ढेर के पास बैठा रहा। मालिक की दया से उसे एक काम मिल गया—बर्तन माँजने का। दिन में बारह घंटे काम, दो समय का भोजन और रात को एक तंग कोठरी में नींद का भ्रम।
मगर अमन का मन इस नियति को स्वीकारने को तैयार नहीं था। रात को जब बाकी बच्चे सोते, वह टूटे हुए स्ट्रीट लैंप की रोशनी में अपने स्कूल की पुरानी किताबें पढ़ता। धीरे-धीरे उसने ओपन स्कूल से दसवीं की परीक्षा दी, फिर बारहवीं। उसका लक्ष्य एक स्पष्ट आकार लेने लगा।
अमन के भीतर वह जिद थी जो पत्थर को भी पानी कर दे। उसने सेना भर्ती की तैयारी की। सुबह चार बजे उठकर दौड़ना, दिन में होटल का काम और रात को पढ़ाई—यह दिनचर्या सालों तक चली।
आखिर वह दिन आया जब उसे भारतीय सेना में भर्ती होने का बुलावा मिला। वर्दी पहनते ही उसे लगा मानो उसने अपने जीवन का पहला युद्ध जीत लिया हो। ट्रेनिंग के कठोर दिनों में भी उसकी आँखों में वह सपना जिंदा रहा—एक दिन वह समाज के लिए कुछ ऐसा करेगा जो उसके जैसे बच्चों की तकदीर बदल देगा।
छह साल की सेना सेवा के बाद अमन ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का निर्णय लिया। वाराणसी लौटकर जब वह गंगा के घाट पर बैठा था, तब उसकी मुलाकात शाज़िया रहमान से हुई।
शाज़िया रहमान विधवा थीं, मगर समाज की दीवारें उनके इरादों को रोक न सकीं। उन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद अपना जीवन अनाथ बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास के लिए समर्पित कर दिया। वे वाराणसी के हर बच्चे को पढ़ाना चाहती थीं ताकि किसी अमन को अपनी किस्मत से लड़ना न पड़े।
शाज़िया ने अमन में वही पीड़ा और जिद देखी जो कभी उनके अपने जीवन में थी। वे अमन के लिए मार्गदर्शक, माँ और सबसे बड़ी मित्र बन गईं। उन्होंने अमन को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया। अमन ने इतिहास में स्नातकोत्तर और बी.एड. पूरा किया।
गंगा की लहरें उस दिन कुछ विशेष मंत्र बुदबुदा रही थीं। घाट पर बैठा अमन किताब पढ़ रहा था, तभी सामने एक युवती पुस्तक पढ़ते हुए उसकी बगल में आ बैठी। वह थी नाज़ अंसारी।
नाज़ का जीवन भी कम संघर्षपूर्ण नहीं था। वह अंग्रेज़ी साहित्य में मास्टर्स कर रही थीं और वाराणसी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थीं। विचारों में प्रगतिशील, आत्मा से भारतीय, नाज़ की आँखों में एक गहराई थी। अमन और नाज़ के बीच पढ़ाई, समाज सेवा और जीवन के उद्देश्यों को लेकर चर्चा शुरू हुई।
धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ती गईं। घाट पर घंटों की चर्चा, सामाजिक मुद्दों पर बहस, और एक-दूसरे के जीवन की अनकही कहानियाँ दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बुनने लगीं।
जब अमन और नाज़ ने अपने रिश्ते को नाम देने का निर्णय लिया तो समाज का असली चेहरा सामने आया। धर्म, जाति और सामाजिक स्थिति की बेड़ियाँ उनके रास्ते में दीवार बन गईं।
सभी ने ताने मारे — "हिन्दू और मुस्लिम साथ नहीं रह सकते," "गरीब और प्रतिष्ठित का मेल संभव नहीं।" धमकियाँ, बहिष्कार और अपमान की बौछारें शुरू हो गईं। मगर इस बार अमन अकेला नहीं था। नाज़ उसके साथ थी, शाज़िया रहमान उसके साथ थीं।
आखिरकार दोनों ने बेहद सादगी से विवाह किया। गवाह थे गंगा के पावन जल और उनके नेक इरादे।
शादी के बाद अमन और नाज़ ने मिलकर एक सपना बुना। उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी — अपने अनुभव — को समाज के काम में लगाने का निर्णय लिया।
वाराणसी में उन्होंने 'किस्मत और हौसला पुस्तकालय' की स्थापना की। यह केवल पुस्तकालय नहीं था, यह था एक बदलाव का केंद्र। यहाँ हर गरीब बच्चा बिना फीस के पढ़ सकता था। महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र, युवाओं के लिए करियर मार्गदर्शन, बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार प्रशिक्षण—यह सब शुरू हुआ।
पुस्तकालय में रोज़ शाम 'संघर्ष संवाद' होता जहाँ अमन अपनी जीवन कहानी सुनाता। नाज़ बच्चों को अंग्रेज़ी और नैतिक शिक्षा सिखातीं।
समय के साथ 'किस्मत और हौसला' का प्रभाव केवल वाराणसी तक सीमित नहीं रहा। नेपाल में भूकंप के बाद राहत अभियान, अफ्रीका के आदिवासी क्षेत्रों में महिला शिक्षा केंद्र, राजस्थान के मरुस्थलों में मोबाइल लाइब्रेरी — अमन और नाज़ की जोड़ी ने सेवा की एक वैश्विक मिसाल कायम की।
उन्हें संयुक्त राष्ट्र में आमंत्रित किया गया। जिनेवा के मंच पर अमन ने कहा — "हमारा संघर्ष हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। हर इंसान में वो ताकत होती है जो उसकी किस्मत बदल सकती है। अगर मैं बदल सकता हूँ, तो कोई भी बदल सकता है।"
कुछ साल बाद अमन और नाज़ के घर एक बेटी का जन्म हुआ — ज़िया। उन्होंने उसे वही मूल्य दिए जो उनके जीवन का आधार थे। ज़िया ने बचपन से ही पुस्तकालय में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। वह समाज सेवा की मशाल की अगली वाहक बन गई।
अंतिम वर्षों में अमन और नाज़ ने अपने जीवन के हर पल को बच्चों, महिलाओं और पीड़ितों के जीवन संवारने में बिताया। अमन की अंतिम इच्छा थी कि उसका अस्तित्व गंगा में विलीन हो जाए, और उसके द्वारा शुरू किया गया कार्य कभी न रुके।
उनके जाने के बाद नाज़ ने कार्य को और अधिक विस्तार दिया। आज 'शाज़िया रहमान स्मृति पुस्तकालय' केवल वाराणसी ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में परिवर्तन का प्रतीक बन चुका है। हर वर्ष हज़ारों बच्चे यहाँ से पढ़कर अपने जीवन की किस्मत बदल रहे हैं।
अमन और नाज़ की प्रेम कथा, सेवा और संघर्ष की गाथा आज दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। उनके जीवन का संदेश है — 'किस्मत हाथों में नहीं, हौसले में बसती है।'
आज भी वाराणसी की गलियों में कोई अनजान बच्चा रोता है तो किताबों के ढेर से कोई आवाज़ गूंजती है —
"उठो... हौसला रखो... किस्मत बदलनी है।"
यह कहानी समाप्त नहीं होती, क्योंकि यह कहानी हर उस दिल की है जो जीवन की कठोरता के सामने झुकता नहीं। यह कहानी है... किस्मत और हौसले की।

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