भारतीय शिक्षक की स्थितिः खोती आज़ादी और घटता सम्मान

भारतीय शिक्षक की स्थितिः खोती आज़ादी और घटता सम्मान



शिक्षक दिवस का उत्सव हर साल आता है और चला जाता है। इस दिन गुरु की महिमा का गुणगान होता है, उन्हें सम्मान की पदवी दी जाती है, लेकिन हकीकत में उनकी स्थिति पहले से कहीं अधिक दीन-हीन हो चुकी है। यह केवल आर्थिक तंगी की बात नहीं है, बल्कि उनकी **शैक्षणिक स्वायत्तता** और **अभिव्यक्ति की आज़ादी** की बात है, जो अब उनसे छीनी जा रही है। आज के समय में, शिक्षकों के लिए श्रद्धा के संदेश मात्र एक खोखली औपचारिकता बन गए हैं, जो उनकी वास्तविक पीड़ा को ढकने का प्रयास करते हैं।


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पाठ्यक्रम पर नियंत्रण और बाहरी हस्तक्षेप


विश्वविद्यालयों में शिक्षकों को कभी यह अभिमान होता था कि अपनी कक्षा और पाठ्यक्रम पर उनका पूर्ण नियंत्रण है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह गर्व धीरे-धीरे खत्म हो गया है। अब पाठ्यक्रम का निर्धारण शीर्ष स्तर पर बैठे अधिकारियों द्वारा किया जाता है, जो अक्सर विषय विशेषज्ञ नहीं होते। अक्सर यह निर्देश 'ऊपर से' आते हैं। "भारतीय ज्ञान परंपरा" जैसे विषयों को हर पाठ्यक्रम में शामिल करने का तर्क सिर्फ़ इतना दिया जाता है कि यह **राष्ट्रीय शिक्षा नीति** में लिखा है। शिक्षकों की राय का कोई मूल्य नहीं रह गया है, और वे खुद भी अपने इस अधिकार को एक 'उच्चतर सत्ता' के हवाले करने को तत्पर दिखते हैं।


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डिजिटल निगरानी और भय का माहौल


कक्षा अब संवाद का एक स्वतंत्र स्थान नहीं रही। अब हर कदम पर **निगरानी** रखी जा रही है। कई जगहों पर कैमरे लगाए गए हैं और विद्यार्थियों के पास मौजूद मोबाइल फ़ोन ने शिक्षकों के व्याख्यानों को स्थायी बना दिया है। पहले कक्षा में कही गई बात क्षणभंगुर होती थी, जो केवल शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच रहती थी। लेकिन अब यह रिकॉर्ड होकर बाहर भी जा सकती है, जिसके नतीजे भयावह हो सकते हैं। पिछले एक दशक में, कई शिक्षकों को उनके व्याख्यान के लिए निलंबित किया गया है, उन पर शारीरिक हमले हुए हैं और नौकरी से निकाला गया है। इस भय के कारण शिक्षक आत्म-सेंसरशिप करने लगे हैं। वे सोच-समझकर बात करते हैं, जिससे विद्यार्थियों को एक सेंसर की हुई शिक्षा मिलती है।


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विभाजित समुदाय और पेशेवर नैतिकता का ह्रास


इस दयनीय स्थिति में सबसे दुखद पहलू यह है कि शिक्षकों का एक तबका ही अपने पेशे के लोगों के खिलाफ खड़ा हो गया है। तथाकथित राष्ट्रवादी शिक्षकों की एक फौज तैयार हो गई है, जिनकी निष्ठा अपने ज्ञान के क्षेत्र से नहीं, बल्कि एक खास विचारधारा और सत्ता से है। इन 'अ-अध्यापकों' की नियुक्ति उनकी दक्षता के बजाय राजनीतिक संबद्धता के आधार पर हो रही है। ये अपनी योग्यता कक्षा में नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में साबित करना चाहते हैं। जेएनयू जैसे संस्थानों में भी वरिष्ठता का उल्लंघन कर अधिकारियों की नियुक्ति हो रही है, जिससे योग्य शिक्षकों का मनोबल गिर रहा है।


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निष्कर्ष


आज शिक्षक सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं हैं; वे शोध करते हैं, लिखते हैं और सार्वजनिक विमर्श में भाग लेते हैं। लेकिन अब इन सभी गतिविधियों पर राष्ट्रवादी नियंत्रण बढ़ रहा है। शोध के अवसर और अनुमति भी राष्ट्रवादी शर्तों पर मिलती है। अशोका यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां शिक्षकों को सरकार के लिए असुविधाजनक बातें कहने या लिखने पर नौकरी से निकाल दिया गया।


शिक्षक की यह दयनीय अवस्था एक गंभीर संकट का संकेत है। क्या इस स्थिति से मुक्ति केवल शिक्षक के अपने हाथ में है? या समाज, जो शिक्षकों को 'गुरु ब्रह्मा' कहता है, उसका भी कोई दायित्व है? यह सवाल हम सभी के लिए एक चुनौती है।

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