अरावली पर्वतमाला : अतीत की धरोहर, वर्तमान की चुनौती और भविष्य की पुकार
अरावली पर्वतमाला केवल चट्टानों और पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा में रची-बसी एक प्राचीन जीवनरेखा है। लगभग 250 करोड़ वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली यह पर्वतमाला भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास, संस्कृति, भूगोल, राजनीति और मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालती आई है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
अरावली ने भारत के इतिहास को दिशा दी है। यहीं से अनेक सभ्यताओं ने जीवन पाया। मेवाड़, मारवाड़, अंबेर और दिल्ली जैसे ऐतिहासिक क्षेत्र अरावली की छाया में फले-फूले। राजपूतों के दुर्ग—कुंभलगढ़, चित्तौड़, रणथंभौर—इन पर्वतों की गोद में खड़े होकर आज भी स्वाभिमान और शौर्य की कहानी कहते हैं। भील, मीणा, गरासिया जैसे जनजातीय समुदायों की संस्कृति, लोकगीत, परंपराएँ और जीवनशैली अरावली से गहराई से जुड़ी हैं। यह पर्वतमाला उनकी माता है—पालन करने वाली, संरक्षण देने वाली।
भौगोलिक और पर्यावरणीय भूमिका
भूगोल की दृष्टि से अरावली थार मरुस्थल के प्रसार को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। यह पर्वतमाला मानसून पवनों को दिशा देकर राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी भारत में वर्षा का संतुलन बनाए रखती है। अरावली क्षेत्र में बहने वाली नदियाँ—बनास, साबरमती, लूणी—करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। साथ ही यह क्षेत्र भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
आज अरावली केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी की कसौटी बन चुकी है। अवैध खनन, जंगलों की कटाई, रियल एस्टेट का अंधाधुंध विस्तार और प्रशासनिक उदासीनता ने अरावली को गंभीर संकट में डाल दिया है। राजनीतिक नीतियाँ यदि विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश करें, तो वह विकास नहीं बल्कि भविष्य का अपहरण है। अरावली का क्षरण सीधे-सीधे दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण, जल संकट और बढ़ते तापमान का कारण बन रहा है।
मानव जीवन पर प्रभाव
अरावली के कमजोर होने का प्रभाव सबसे पहले आम जनता पर पड़ता है— जलस्तर गिरता है, खेती संकट में आती है, स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती हैं, जलवायु असंतुलन जन्म लेता है। एक शिक्षक और छात्र परामर्शदाता के रूप में मैंने विद्यार्थियों में बढ़ती पर्यावरणीय चिंता और असुरक्षा को महसूस किया है। जब प्रकृति असुरक्षित होती है, तो मानव का भविष्य भी असुरक्षित हो जाता है।
सरकार और जनता से अपील
आज समय आ गया है कि सरकार और जनता मिलकर अरावली के संरक्षण को राष्ट्रीय कर्तव्य मानें। सरकार से अपेक्षा है कि—
अवैध खनन पर कठोर कार्रवाई हो
अरावली को पूर्ण रूप से संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए
विकास योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन अनिवार्य हो
जनता से आग्रह है कि—
पर्यावरणीय जागरूकता फैलाए
स्थानीय आंदोलनों का समर्थन करे
प्रकृति-विरोधी नीतियों के प्रति सवाल उठाए
निष्कर्ष
अरावली केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा कवच है। यदि हमने आज इसे नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी। एक पूर्व सैनिक विद्यालय के इतिहास प्रवक्ता और वर्तमान छात्र परामर्शदाता के नाते मेरा विश्वास है कि राष्ट्र निर्माण केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि जंगलों, पर्वतों और नदियों की रक्षा से भी होता है। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें— अरावली बचेगी, तो भारत बचेगा।
आगे के कदम
अरावली के संरक्षण के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। हमें अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा और इसे निभाने के लिए तैयार रहना होगा। आइए, हम सब मिलकर अरावली को बचाने के लिए एकजुट हों और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य का निर्माण करें।
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