अल्वारो मुनेरा (Álvaro Múnera) की मर्मस्पर्शी कहानी
एक सांडों की लड़ाई (bullfight) के बीच में, अल्वारो मुनेरा ने कुछ ऐसा किया जिसने देखने वाले हर शख्स को दंग कर दिया।
भीड़ गरज रही थी। सांड पूरी ताकत से हमला कर रहा था। वह क्षण आ चुका था जिसकी मांग यह पारंपरिक अनुष्ठान करता है। मुनेरा ने अपनी 'केप' (लाल कपड़ा) उठाई और बिल्कुल वैसे ही चले जैसा उन्हें सालों के प्रशिक्षण ने सिखाया था।
और फिर वह रुक गए।
वह रेत पर नीचे धंस गए और वहीं बैठ गए। कोई दिखावा नहीं। भीड़ के लिए कोई इशारा नहीं। बस सन्नाटा। शोर धीरे-धीरे थम गया, और उसकी जगह उलझन और अविश्वास ने ले ली।
बाद में, उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि उनके भीतर क्या बदला था। उन्होंने कहा कि वे सींग अब उन्हें खतरा नहीं लग रहे थे। जब उनकी नज़रें सांड की आँखों से मिलीं, तो उन्हें उसमें गुस्सा नहीं दिखा। उन्हें डर दिखा। मासूमियत दिखी। एक ऐसा जानवर जिसे उस हिंसा के लिए मजबूर किया गया था जिसे उसने कभी चुना ही नहीं था।
बाद में उन्होंने कहा, "यह कोई लड़ाई नहीं थी। यह क्रूरता थी।"
उन्होंने अपनी तलवार नीचे रख दी और अखाड़े (arena) से बाहर निकल गए, यह जानते हुए कि वह अब कभी वापस नहीं लौटेंगे।
उस क्षण ने एक 'माटाडोर' (सांड से लड़ने वाला) के रूप में उनके जीवन का अंत कर दिया, लेकिन एक दूसरा रास्ता खोल दिया। मुनेरा सांडों की लड़ाई और पशु दुर्व्यवहार के मुखर आलोचक बन गए। उन्होंने छात्रों से बात की, अपने इस बदलाव के बारे में लिखा, और जानवरों की रक्षा करने वाले समूहों के साथ मिलकर काम किया। उन्होंने सिखाया कि सहानुभूति परंपरा से कहीं अधिक मायने रखती है, और असली बहादुरी का मतलब उस समय नुकसान पहुँचाने से इनकार करना हो सकता है जब आपसे नुकसान पहुँचाने की उम्मीद की जा रही हो।
कई लोगों ने उन पर अपनी संस्कृति के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया। अन्य लोग इस बात पर हंसे कि दया का भाव तालियों की गड़गड़ाहट से ज्यादा भारी कैसे हो सकता है। पर वह पीछे नहीं हटे।
वह व्यक्ति जिसने कभी वाहवाही के लिए जान ली थी, उसने इसके बजाय दया के लिए खड़े होने को चुना। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि कोई भी प्रथा सवाल से परे नहीं है, और कोई भी जीवन एक ही भूमिका में कैद नहीं है।
कभी-कभी एक पल में सब कुछ बदल जाता है।
एक नज़र।
एक चुनाव।
दूर चले जाने का एक शांत फैसला।

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