क्यों हो रही नई पीढ़ी संस्कारहीन ? कारण और निवारण
भारतीय समाज, जो अपनी मर्यादा, सभ्यता और नैतिक मूल्यों के लिए विश्व भर में विख्यात था, आज बदलाव के एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ 'स्वतंत्रता' और 'उच्छृंखलता' के बीच की रेखा धुंधली पड़ती जा रही है।
यहाँ इस समस्या के मूल कारणों और सुधार के मार्गों पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:
भारतीय समाज में बढ़ती नैतिक गिरावट: कारण और समाधान
वर्तमान समय में समाज के एक बड़े वर्ग में, विशेषकर युवा पीढ़ी और कुछ हद तक महिलाओं व पुरुषों में, व्यवहारिक गिरावट देखी जा रही है। जिसे हम 'बदतमीजी' या 'बेशर्मी' कह रहे हैं, वह असल में गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट का संकेत है।
1. गिरावट के मुख्य कारण
* पारिवारिक संरचना का टूटना: पहले संयुक्त परिवारों में दादा-दादी और बड़े-बुजुर्ग बच्चों पर नैतिक अंकुश रखते थे। एकल परिवारों (Nuclear Families) में माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्चों को वह समय और संस्कार नहीं मिल पा रहे, जो उनके चरित्र निर्माण के लिए आवश्यक हैं।
* सोशल मीडिया और पाश्चात्य अंधानुकरण: इंटरनेट ने अश्लीलता और अभद्रता को 'कूल' (Cool) बना दिया है। 'रील्स' और छोटे वीडियो के चक्कर में लोकप्रियता पाने के लिए लोग मर्यादा की सीमाएं लांघ रहे हैं। जब समाज अभद्रता को 'व्यूज' और 'लाइक' देता है, तो वह सामान्य व्यवहार बन जाता है।
* शिक्षा का बाजारीकरण: आज की शिक्षा केवल 'डिग्री' और 'पैसा' कमाने का जरिया बन गई है। शिक्षण संस्थानों से 'नैतिक शिक्षा' (Moral Science) गायब हो चुकी है। शिक्षक अब मार्गदर्शक कम और सेवा प्रदाता (Service Provider) अधिक बन गए हैं।
* माता-पिता का व्यवहार: जैसा कि आपने कहा, यदि नींव ही कमजोर है तो इमारत कैसी होगी? कई बार माता-पिता स्वयं अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं या बच्चों की गलतियों को 'बचपना' कहकर नजरअंदाज कर देते हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं।
2. कौन है जिम्मेदार?
इस गिरावट के लिए कोई एक पक्ष नहीं, बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) जिम्मेदार है:
* अभिभावक: जो बच्चों को भौतिक सुविधाएं तो दे रहे हैं, लेकिन समय और संस्कार नहीं।
* मनोरंजन उद्योग: फ़िल्में, वेब सीरीज और गाने जो अश्लीलता और गाली-गलौज को वीरता या आधुनिकता के रूप में पेश करते हैं।
* समाज: जो अब गलत को टोकना छोड़ चुका है। "हमें क्या लेना-देना" वाली सोच ने उपद्रवियों के हौसले बुलंद किए हैं।
3. निवारण और सुधार के मार्ग
सुधार की प्रक्रिया कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं:
* 'संस्कार' को 'शिक्षा' से ऊपर रखें: घर में बच्चों को महापुरुषों की कहानियां सुनाएं और उन्हें बड़ों का सम्मान करना सिखाएं। अनुशासन को कठोरता नहीं, बल्कि जीवन शैली का हिस्सा बनाएं।
* डिजिटल उपवास और निगरानी: बच्चों (और स्वयं भी) के स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखें। वे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं और किन आदर्शों को अपना रहे हैं, इस पर नजर रखना अनिवार्य है।
* मर्यादा का पुनरुत्थान: महिलाओं और पुरुषों, दोनों को समझना होगा कि 'आधुनिक' होने का अर्थ 'अमर्यादित' होना नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी की अपनी एक सीमा होती है।
* सामाजिक बहिष्कार: जब समाज अभद्र और अश्लील व्यवहार करने वालों को सम्मान देना बंद कर देगा और उन्हें टोकना शुरू करेगा, तभी बदलाव आएगा।
निष्कर्ष
समाज का पतन तब होता है जब लोग 'सही' और 'गलत' के बीच का अंतर भूलकर केवल 'सुविधा' और 'प्रसिद्धि' को चुनने लगते हैं। यदि हमें भारतीय समाज को फिर से उत्कृष्ट बनाना है, तो शुरुआत स्वयं के घर से करनी होगी।
> "शिक्षित व्यक्ति समाज की संपत्ति हो सकता है, लेकिन सुसंस्कृत व्यक्ति समाज का आधार होता है।"

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