शिक्षा :एक महत्वपूर्ण कर्तव्य

 तिरुवनंतपुरम के एक साधारण से गांव कुमारपुरम में जन्मे सुरेंद्रन को दुनिया आज अभिनेता इंद्रंस के नाम से जानती है। बचपन में वे कुशाग्र बुद्धि थे और कक्षा की पहली बेंच पर बैठकर पढ़ाई में अव्वल आया करते थे। आंखों में भविष्य के कई सपने तैरते थे, लेकिन घर के हालात बेहद तंग थे। सात भाई-बहनों का बड़ा परिवार और सीमित साधन। चौथी कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते गरीबी इस कदर आड़े आई कि परिवार स्कूल की वर्दी और कॉपियों का खर्च भी नहीं उठा सका। हालात से मजबूर होकर एक मेधावी बालक को बस्ता खूंटी पर टांगना पड़ा।




शिक्षा छूटने के बाद उन्होंने जीवन यापन के लिए सिलाई का काम सीखा। कई वर्षों तक वे दरजी की दुकान पर कैंची और सुई-धागे से कपड़े सिलते रहे। यही हुनर उन्हें सिनेमा की दहलीज तक ले गया। उन्होंने फिल्मों में बतौर कॉस्ट्यूम डिजाइनर काम शुरू किया और कलाकारों के कपड़े तैयार करने लगे। कपड़ों की सिलाई करते-करते उनके भीतर छिपे संवेदनशील कलाकार को मंच मिलने लगा। 1980 के दशक में उन्हें छोटे-मोटे हास्य दृश्य मिलने शुरू हुए। अपनी छरहरी काया और अनोखी कॉमिक टाइमिंग के कारण वे दर्शकों के चहेते तो बने, लेकिन सिनेमा ने उन्हें दशकों तक सिर्फ मसखरे और हास्य अभिनेता के सांचे में बांधे रखा।


सच्चा कलाकार सीमाओं में नहीं बंधता। इंद्रंस ने लगातार खुद को तराशा और अपनी सादगी को अपनी ताकत बनाया। जब 2018 में फिल्म आलोरुक्कम आई, तो उन्होंने अपनी गंभीर और मर्मस्पर्शी अदाकारी से आलोचकों को स्तब्ध कर दिया। 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उन्हें विशेष जूरी पुरस्कार से नवाजा गया और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का केरल राज्य फिल्म पुरस्कार भी मिला। इसके बाद होम जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने देश-विदेश के दर्शकों के दिलों को गहराई से छू लिया।


चार दशकों की अनवरत मेहनत के बाद जब शोहरत, सम्मान और राष्ट्रीय स्तर की पहचान उनके कदमों में थी, तब भी उनके दिल के किसी कोने में वह बालक जीवित था जिसकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। वर्ष 2024 में, 68 वर्ष की परिपक्व आयु में, जब अधिकांश लोग सक्रिय जीवन से विश्राम ले लेते हैं, इंद्रंस तिरुवनंतपुरम के मेडिकल कॉलेज हाई स्कूल पहुंचे। उन्होंने राज्य साक्षरता मिशन के तहत सातवीं कक्षा की तुल्यता परीक्षा दी। जब वे परीक्षा कक्ष में एक साधारण छात्र की तरह डेस्क पर बैठे, तो उनके चेहरे पर वही सहज कौतूहल और चमक थी जो छह दशक पहले स्कूल छूटते समय खो गई थी। उनका अगला लक्ष्य दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करना है।


इंद्रंस की यह यात्रा महज एक अभिनेता की कामयाबी की दास्तान नहीं है, बल्कि इंसानी जिजीविषा और ज्ञान की अनंत प्यास का जीवंत दस्तावेज है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि परिस्थितियां आपकी गति को रोक सकती हैं, आपकी दिशा को मोड़ सकती हैं, लेकिन अगर मन में सीखने की लौ और आत्मा में सरलता जीवित हो, तो कोई भी सपना कभी पुराना नहीं पड़ता।


लेखक - अमन मान, प्रवक्ता, सेना विद्यालय, भारत

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